जालंधर :जिंदगी को जिंदादिली, ईमानदारी और ‘सरबत के भले’ (सबके कल्याण) के सिद्धांत पर कैसे जिया जाता है, इसकी जीती-जागती मिसाल बन चुके हैं श्री कुन्दन सिंह जी। आज 1 जुलाई, 2026 को कुन्दन सिंह जी अपने जीवन के गौरवमयी 100 वर्ष (शताब्दी) पूरे कर रहे हैं। इस खास मौके पर उनका परिवार और करीबी बेहद उत्साहित हैं। आइए जानते हैं विभाजन की त्रासदी से लेकर एक सफल और स्वस्थ जीवन तक के उनके इस अद्भुत सफर के बारे में।
1. विभाजन का दंश और संघर्षों से भरा शुरुआती जीवन
श्री कुन्दन सिंह जी का जन्म 1 जुलाई, 1926 को अविभाजित भारत के तहसील कसूर, जिला लाहौर (अब पाकिस्तान) में हुआ था। उन्होंने अपने जीवन में देश के विभाजन का गहरा दर्द झेला है।
रेलवे में नौकरी की शुरुआत: उन्होंने 31 अक्टूबर, 1947 को भारतीय रेलवे में अपनी सेवाएं शुरू कीं।
शुरुआती तंगी: विभाजन के बाद देश बदलने और आर्थिक तंगी का सामना करने के बावजूद, उन्होंने कभी हार नहीं मानी।
विवाह: कठिन परिस्थितियों के बीच, 22 नवम्बर, 1948 को उनका विवाह स्वर्गीय गोमा बन्ती जी के साथ हुआ।



2. ईमानदारी की मिसाल और रेलवे विभाग का आभार
कुन्दन सिंह जी ने अपने जीवन में हमेशा मेहनत और ईमानदारी का रास्ता चुना और कभी भी गलत शॉर्टकट नहीं अपनाया। वे 30 जून, 1984 को रेलवे से सेवानिवृत्त (रिटायर) हुए थे।
“मैं भारत सरकार और रेलवे विभाग का दिल से धन्यवादी हूँ। रेलवे मुझे पिछले कई दशकों से नियमित पेंशन दे रहा है, जिसने मुझे और मेरे परिवार को स्वावलम्बी (आत्मनिर्भर) बनाए रखा।” — श्री कुन्दन सिंह
एक दिलचस्प और गर्व की बात यह भी है कि उनके नक्शेकदम पर चलते हुए उनका बड़ा बेटा भी रेलवे से ही सेवानिवृत्त हुआ है, जबकि उनके छोटे बेटे डॉ. राकेश मदान वर्तमान में भी रेलवे विभाग में अपनी सेवाएं दे रहे हैं।
3. भरा-पूरा परिवार और समाज में सम्मान
कुन्दन सिंह जी के परिवार में दो बेटियां और तीन बेटे हैं। पिता के दिए संस्कारों की बदौलत आज सभी बच्चे पूरी तरह संपन्न हैं और समाज में एक प्रतिष्ठित नाम कमा चुके हैं।
4. क्या है 100 साल की उम्र में भी ‘सुपर हेल्थ’ का राज?
आज के दौर में जहां लोग 50-60 की उम्र में बीमारियों से घिर जाते हैं, वहीं कुन्दन सिंह जी 100 वर्ष की उम्र में भी पूरी तरह स्वस्थ हैं। उनके इस दीर्घायु और अच्छे स्वास्थ्य के मुख्य सूत्र निम्नलिखित हैं:
सात्विक और शाकाहारी जीवन: वे हमेशा सात्विक भोजन करते हैं और पूरी तरह नशामुक्त जीवन जीते हैं।
सकारात्मक सोच: उनके जीवन का एकमात्र मंत्र रहा है—’सरबत का भला’ (यानी सबका भला सोचना)। वे ईश्वर या जिंदगी से कोई गिला-शिकवा नहीं रखते। उनका मानना है कि ईश्वर ने उन्हें और उनके परिवार को सामर्थ्य से अधिक दिया है।
पैदल चलने की आदत: एक हैरान करने वाली बात यह है कि उन्होंने अपनी जिंदगी में कभी साइकिल चलाना भी नहीं सीखा। उन्हें रिक्शा पर बैठना ‘अमानवीय’ लगता था, इसलिए वे हमेशा पैदल ही चले। यही पैदल चलने की आदत आज उनकी सेहत का सबसे बड़ा राज है।
दवाइयों से दूरी: इस उम्र में भी वे कभी-कभार केवल कैल्शियम या विटामिन की गोली लेने के अलावा कोई अन्य दवाई नहीं खाते। उन्होंने कभी भी बीमारी या स्वास्थ्य को खुद पर हावी नहीं होने दिया।
सक्रिय दिनचर्या: रोजाना अखबार पढ़ना और नियमित रूप से हल्का व्यायाम करना आज भी उनकी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा है।
5. कैसे मनेगा 100वां जन्मदिन?
अपने इस ऐतिहासिक 100वें जन्मदिन को मनाने के लिए कुन्दन सिंह जी की योजना बेहद सादगीपूर्ण और आध्यात्मिक है। सुबह वे मंदिर और गुरुद्वारा जाकर माथा टेकेंगे और ईश्वर का शुक्रिया अदा करेंगे। वहीं शाम को उनके परिवार ने कुछ करीबी दोस्तों को आमंत्रित कर स्थानीय होटल में एक शानदार बर्थ-डे पार्टी का आयोजन किया है।
सौ वर्ष के इस प्रेरणादायी सफर को पूरा करने पर पूरे परिवार की ओर से श्री कुन्दन सिंह जी को जन्मदिवस की कोटि-कोटि बधाई एवं उनके उत्तम स्वास्थ्य की मंगलकामना!












